इश्क ये था कि

इश्क ये था कि .......
बिलाल (रज़ी अल्लाहु अनह) ने नबी ऐ करीम(सल्लाहु अलय्ही वस्सल्लम) के इंतेक़ाल के बाद अज़ान देना छोड़ दिया।

इश्क ये था कि .......
बिलाल (रज़ी अल्लाहु अनह) ने नबी करीम (सल्लाहु अलय्ही वस्सल्लम)के इंतेक़ाल के बाद मदीना शरीफ में रहना ही छोड़ दिया कि अब उनका मदीना में दिल नहीं लगता है कि हर कूचे और दर और दीवार से मेहबूब की यादें जुड़ी थी। और नबी करीम (सल्लाहु अलय्ही वस्सलम) की जुदाई बर्दाश्त नही होती थी।

इश्क ये था कि .......
जब बिलाल (रज़ी अल्लाह अन्हु) ने अपनी महबूब को सपने में देखा जो उनसे कह रहे थे कि "हे बिलाल, हमसे इतनी दूरी क्यों?" जब आपको रोज़ा ऐ अतहर(क़बर ऐ रसूल) की ज़ियारत किए अधिक समय बीत गया था, तो जागते ही तुरंत मदीना शरीफ की ओर निकल पड़े।

इश्क ये था कि.......
बिलाल (रज़ी अल्लाह अन्हु) आधी रात पहुंचे, तो इमाम हसन व हुसैन (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने उन्हें मक़ाम ऐ नबी करीम (सल्लाहु अलय्ही वस्सलम) पर पाया कि आप ज़ार औ क़तार यानी बराबर रो रहे थे।

इश्क ये था की......
जब इमाम हसन व हुसैन (रज़ी अल्लाहु अन्हु) उन्हें सुबह की अज़ान(फ़ज्र की अज़ान) देने की फरमाइश की, तो अपने महबूब के चहेते नवासों (नातियों)को इनकार न कर सके। और जब अज़ान दी तो अज़ान क्या दी कि नबी करीम (सल्लाहु अलय्ही वस्सलम) का पूरा समय पुनर्जीवित कर दिया। सहाबा (आप सल्लाहु अलय्ही वसल्लम के साथी) उमड़ पड़े। ज़ार और दहाड़े मारकर रोने लगे, गम से निढाल नबी की याद चूर, सारा दुख फिर ताजा हो गया। सारे घाव हरे हो गए।

इश्क ये था कि .......
हज़रत उमर (रज़ी अल्लहु अन्हु)की फरमाइश पर जब हज़रत बिलाल (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने सीरिया में सेना को अज़ान दी, तो "अशहदु अन्ना मुहम्मद उर रसूलुल्लाह" कहते हुए आवाज़ घिघया गई , आवाज गले में फंस गई। नबी की याद में यूं दहाड़े मारके रोये कि आँसुओ की झड़ी लग गई। अज़ान पूरी नहीं कर सके। खुद भी रोए और सबको रुला दिया, जबकि अमीरु मोमिनीन हज़रत उमर (रज़ी अल्लाह अन्हु) सबसे भावुक हुए

इश्क ये था कि .......
  जब बिलाल (रज़ी अल्लहु अन्हु) मृत्युशय्या पर थे, मौत आने वाली थी। रिश्तेदार देखकर रो रहे थे। और बिलाल कह रहे थे, "कल मैं अपने महबुबों से मिलूंगा, मोहम्मद (सल्लाहु अलय्ही वसल्लम) और सहाबा ऐ इकराम (रिजवानु अल्लाही अलैहिम अज़माईंन) से"
अल्लाह पाक हमें ऐसा सच्चा प्रेम करने की तौफ़ीक़ दे ।
आमीन .......ताकि हम इश्क़ औ मुहब्बत का हक़ अदा कर सकें,और सच्चे आशिक़ कह लाएँ ।

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